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“प्रयागराज में बिरहा उत्सव का आगाज: महाकुंभ-2025 की तैयारियों में लोक संगीत का जादू”

प्रयागराज में बिरहा उत्सव का आगाज

प्रयागराज, 6 नवंबर 2024 — महाकुंभ-2025 की तैयारियों के अंतर्गत उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, प्रयागराज और जिला प्रशासन द्वारा पाँच दिवसीय “बिरहा उत्सव” का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का शुभारंभ बुधवार को नेता नगर, करमा में हुआ, जहां नरेंद्र जायसवाल, पूर्व अध्यक्ष किसान सेवा सहकारी समिति, और सुरेश चंद्र, अध्यक्ष सहकारी समिति, करमा, ने दीप प्रज्वलित कर उत्सव का आगाज किया।

प्रयागराज में बिरहा उत्सव का आगाज महाकुंभ-2025 की तैयारियों में लोक संगीत का जादू
मुख्य अतिथि के द्वारा दीप प्रज्वलित कर उत्सव का आगाज किया गया।

इस सांस्कृतिक उत्सव में प्रयागराज के प्रसिद्ध बिरहा गायक बचऊ लाल यादव और उनके दल ने पारंपरिक लोक गीतों की प्रस्तुतियों से समां बांध दिया। “पांचों भईया साथे चली,” “द्रौपदी नारी, बेचारी वन में काटे जिवना,” और “भारत की झांसी कितना पवित्र पावन” जैसे गीतों ने श्रोताओं का दिल जीत लिया। उनकी गायकी में भारतीय संस्कृति और लोक परंपराओं की झलक दिखी, जिसने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।

बिरहा के पारंपरिक अंदाज में ओम प्रकाश पटेल और उनके दल ने भी अपनी प्रस्तुति दी। उनके “कोई करे न गुमाना यह तन पे” और “सत्संग करना है, कुसंगत में जाना नहीं है” जैसे भजन सुनकर श्रोता आध्यात्मिक भाव में डूब गए। सीमा और उनके साथी कलाकारों ने “अपने बलम के करीं केतना बड़ाई” गीत प्रस्तुत कर श्रोताओं से खूब तालियां बटोरी।

बिरहा उत्सव का आगाज में ढोलक, हारमोनियम, मजीरा, और करताल जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन ने समां बांध दिया।
Image Source: NCZCC MEDIA GROUP

“प्रयागराज में बिरहा उत्सव का आगाज” में ढोलक, हारमोनियम, मजीरा, और करताल जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन ने समां बांध दिया। इस अवसर पर ढोलक पर प्रेम प्रकाश, हारमोनियम पर सूर्य प्रकाश, मजीरा पर लाल चंद्र, और करताल पर भोलानाथ ने कलाकारों का साथ दिया, जिससे गीतों में और भी गहराई आ गई।

महाकुंभ-2025 की तैयारियों में ना, सिर्फ धार्मिक बल्कि सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण और प्रचार-प्रसार का भी अवसर है। इस उत्सव में बड़ी संख्या में स्थानीय लोग और कला प्रेमी मौजूद रहे, जिन्होंने बिरहा के इस अनोखे सफर का आनंद लिया। प्रयागराज में महाकुंभ-2025 के तहत होने वाले इस तरह के सांस्कृतिक आयोजनों का उद्देश्य लोक कलाओं को बढ़ावा देना और आने वाली पीढ़ियों तक इस विरासत को पहुँचाना है।

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