कुंभ मेला

श्री निरंजनी अखाड़ा में 325 लोगों को नागा संन्यास। महिलाओं की भी भागीदारी

महाकुंभनगर, 19 जनवरी 2025

महाकुंभ 2025 के शुभ अवसर पर श्री निरंजनी अखाड़ा ने 325 लोगों को नागा संन्यासी की दीक्षा देकर एक ऐतिहासिक परंपरा को आगे बढ़ाया। इसमें 10 महिलाएं और 315 पुरुष शामिल हुए। रविवार को सेक्टर-20 में पांटून पुल नंबर पांच और छह के बीच बने घाट पर विधि-विधान से यह आयोजन संपन्न हुआ।

श्री निरंजनी अखाड़ा में 325 लोगों को नागा संन्यास की दीक्षा, महिलाओं ने भी निभाई परंपरा।

श्री निरंजनी अखाड़ा में नागा दीक्षा का पवित्र अनुष्ठान

मुंडन संस्कार और गंगा स्नान से इस दिव्य प्रक्रिया की शुरुआत हुई। गंगा पूजन के बाद पिंडदान किया गया, जिसके माध्यम से दीक्षा लेने वालों ने सांसारिक बंधनों से पूर्णतः मुक्ति का संकल्प लिया। अखाड़े के शिविर में धर्मध्वजा के नीचे अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद और मां मनसा देवी मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष श्रीमहंत रवींद्र पुरी ने नागा संन्यास की परंपरा समझाई और दीक्षा प्रक्रिया संपन्न कराई।

श्री निरंजनी अखाड़ा में नागा दीक्षा का पवित्र अनुष्ठान

त्रिशूल और चिमटा का वितरण

दीक्षा के प्रतीक स्वरूप सभी नव-नागाओं को त्रिशूल और चिमटा भेंट किया गया। श्रीमहंत रवींद्र पुरी ने कहा, “नागा संन्यासी अखाड़े के गौरव और वैभव का प्रतीक हैं। वे तपस्या और संयमित जीवन जीते हुए आत्मा की साधना में रत रहते हैं। नागा बनने के साथ ही यह लोग सांसारिक जीवन से पूरी तरह विरक्त हो गए हैं।”

साधना और संयम की परीक्षा

संन्यास लेने वालों ने 48 घंटे का कठिन उपवास रखा। इस दौरान केवल जल, फल या गाय का दूध ग्रहण किया गया। 24-24 घंटे में केवल दो बार उपवास तोड़ा गया। इस अवधि में सभी ने अखाड़े के आराध्य की साधना में समय बिताया और आंतरिक शुद्धता की प्रक्रिया को अपनाया।

महिलाओं की भागीदारी

इस विशेष आयोजन में 10 महिलाओं ने भी नागा संन्यासी की दीक्षा ग्रहण कर अखाड़े की परंपरा में अपनी भागीदारी निभाई। यह घटना महिला सशक्तिकरण और आध्यात्मिक समर्पण का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।

विशिष्ट उपस्थितियां

इस कार्यक्रम में अखाड़ा सचिव श्रीमहंत रामरतन गिरि, महंत दिनेश गिरि, महंत राधे गिरि, महंत भूपेंद्र गिरि, महंत ओमकार गिरि, महंत शिवबन, महंत नरेश गिरि और महंत राज गिरि सहित अन्य वरिष्ठ संत उपस्थित रहे।

महाकुंभ के लिए नागा संन्यासियों का महत्व

नागा संन्यासी अखाड़ों की दिव्य परंपरा का हिस्सा हैं। इनका जीवन तप और साधना का उदाहरण है, जो महाकुंभ जैसे धार्मिक आयोजनों की पवित्रता और भव्यता को और बढ़ाते हैं।

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