कुंभ मेला

महामंडलेश्वर बनाये गए अमेरिकी संत व्यसानंद। निरंजनी अखाड़े के पंचों ने पट्टाभिषेक कर महामंडलेश्वर की दी उपाधि!

भारतीय साधना परंपराओं के प्रचारक बने महामंडलेश्वर

प्रयागराज स्थित निरंजनी अखाड़े के पंच परमेश्वरों ने छावनी में एक विशेष धार्मिक कार्यक्रम के दौरान विदेशी संत वेद व्यसानंद को महामंडलेश्वर के पद पर आसीन किया।
आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी कैलाशनंद गिरी ने कहा, “वेद व्यसानंद भारतीय योग और साधना परंपराओं के प्रमुख प्रचारक हैं। यह नियुक्ति अखाड़े की धार्मिक परंपराओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाएगी।”

Photo Credit by: Rohit Sharma

महामंडलेश्वर बनने की परंपरा और इसका महत्व

महामंडलेश्वर का पद हिंदू धर्म में साधु-संतों के बीच उच्चतम आध्यात्मिक और धार्मिक प्रतिष्ठा का प्रतीक है। अखाड़ों के पंचपरमेश्वर सर्वसम्मति से इस पद का चयन करते हैं।
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रवींद्र पुरी महाराज ने बताया कि वेद व्यसानंद को अब महामंडलेश्वर स्वामी वेद व्यसानंद के नाम से जाना जाएगा। उन्होंने कहा, “अखाड़े धर्म और समाज में नैतिकता के प्रचार-प्रसार का महत्वपूर्ण केंद्र होते हैं।”

भगवा रंग का महत्व

निरंजनी अखाड़े के सचिव श्री महंत रामरतन गिरी महाराज ने भगवा रंग के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा, “यह त्याग, तपस्या और आध्यात्मिकता का प्रतीक है। भगवा रंग साधु-संतों के धार्मिक जीवन और उनकी साधना का प्रतीक है।”
उन्होंने यह भी कहा कि यह रंग सूर्य और अग्नि का प्रतिनिधित्व करता है और आत्मा के शुद्धिकरण को दर्शाता है।

कार्यक्रम में उपस्थित प्रमुख संत

इस विशेष आयोजन में निरंजनी अखाड़े के सचिव श्री महंत रामरतन गिरी, महामंडलेश्वर स्वामी नर्मदा पुरी, गुरु माँ आनंदमई, स्वामी सोमेश्वरानंद गिरी सहित कई प्रतिष्ठित संत उपस्थित रहे।

अखाड़ों की भूमिका

आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी बालका नंद गिरी महाराज ने कहा, “अखाड़े धार्मिक गतिविधियों के साथ-साथ समाज सुधार और सामाजिक न्याय की दिशा में भी कार्य करते हैं। यह परंपरा समाज में धर्म, नैतिकता और अच्छे आचरण को प्रोत्साहित करती है।”

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