माघ मेला लोक आस्था और जन विश्वास का जीवंत उत्सव, जानिए क्यों है यह आयोजन खास
माघ मेला लोक आस्था और जन विश्वास की सदियों पुरानी परंपरा
प्रयागराज। माघ मेला लोक आस्था और जन विश्वास की वह परंपरा है, जो प्रयागराज को सांस्कृतिक चेतना का केंद्र बनाती है। संगम की पावन रेती पर हर वर्ष साकार होने वाला माघ मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि माघ मेला लोक आस्था और जन विश्वास की वह जीवंत परंपरा है, जो भारतीय संस्कृति, जीवन दर्शन और सामाजिक चेतना को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाती है।
उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, प्रयागराज द्वारा आयोजित ‘चलो मन गंगा–यमुना तीर’ कार्यक्रम के अंतर्गत आयोजित ‘शब्द-ब्रह्म’ संगोष्ठी में वक्ताओं ने माघ मेले के सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व पर विस्तार से विचार रखे।
माघ मेला लोक आस्था और जन विश्वास जीवन प्रबंधन की पाठशाला

वरिष्ठ लेखक एवं इलाहाबाद विश्वविद्यालय के मीडिया अध्ययन केंद्र के कोर्स कोऑर्डिनेटर डॉ. धनंजय चोपड़ा ने कहा कि माघ मेला लोक आस्था और जन विश्वास की असंख्य कथाओं का संगम है। यह मेला न केवल आध्यात्मिक ऊर्जा देता है, बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाता है।
उन्होंने कहा कि कल्पवास आस्था से आगे बढ़कर जीवन प्रबंधन की अनुपम प्रयोगशाला है, जिस पर देश–विदेश के विश्वविद्यालयों में शोध किया जा रहा है। यह परंपरा बदलते समय में समाज को सही दिशा देने का कार्य करती रहेगी।
वैश्विक संवाद का विषय बन चुका है माघ मेला
इस अवसर पर डॉ. श्लेष गौतम ने कहा कि महाकुंभ और माघ मेला भारतीय संस्कृति, धार्मिक चेतना और लोक जीवन का समेकित उत्सव हैं। माघ मेला लोक आस्था और जन विश्वास आज वैश्विक विमर्श का विषय बन चुका है।
उन्होंने कहा कि संगम की त्रिवेणी रेती पर तंबुओं का विस्तार एक आध्यात्मिक लोक का साकार रूप है, जहां वेद, उपनिषद और महाकाव्यों के संदर्भों के साथ जीवन और चेतना पर गहन संवाद होता है।
पौराणिक आधार ही माघ मेले की आत्मा
‘शब्द-ब्रह्म : साहित्य और संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में माघ मेला’ विषय पर बोलते हुए प्रो. राजेंद्र त्रिपाठी ‘रसराज’ ने ब्रह्मपुराण और स्कंद पुराण के साक्ष्यों का उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि माघ माह में समस्त तीर्थों का प्रयाग में समागम ही माघ मेला लोक आस्था और जन विश्वास का मूल आधार है। कल्पवास का माहात्म्य ही इस मेले का प्राण तत्व है, जो आज भी परंपरा के रूप में जीवित है।
दीप प्रज्वलन व मंत्रोच्चारण प्रतियोगिता का आयोजन
कार्यक्रम का शुभारंभ केंद्र निदेशक सुदेश शर्मा एवं उपस्थित वक्ताओं द्वारा दीप प्रज्वलन से हुआ। स्वागत उद्बोधन में उन्होंने कहा कि
“शब्द-ब्रह्म भारतीय संस्कृति की उस चेतना का प्रतीक है, जहां लोक आस्था, साहित्य और जीवन दर्शन का संवाद होता है।”
इसके पश्चात मंत्रोच्चारण प्रतियोगिता आयोजित की गई, जिसमें आशीष पाल, समिष्ठा पाल, परिधि घोष, प्रसुन घोष, प्रबुद्ध पाल, यथार्थ चौबे एवं गौरी ने सहभागिता की। सभी प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया।
संचालन एवं आभार
कार्यक्रम का संचालन डॉ. प्रमोद द्विवेदी ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन कार्यक्रम सलाहकार श्रीमती कल्पना सहाय ने प्रस्तुत किया।
माघ मेला लोक आस्था और जन विश्वास का ऐसा आयोजन है, जो भारतीय समाज की सांस्कृतिक चेतना को मजबूत करता है। संगम की रेती पर बसने वाला यह मेला केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, आत्मिक शुद्धि और जीवन मूल्यों का सजीव उदाहरण है। बदलते समय में भी माघ मेला लोक आस्था और जन विश्वास की परंपरा को जीवित रखते हुए आने वाली पीढ़ियों को भारतीय संस्कृति से जोड़ता रहेगा।
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