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नाद-ब्रह्म शिल्प मेला प्रयागराज में साहित्य और लोकसंस्कृति का उत्सव

नाद-ब्रह्म शिल्प मेला प्रयागराज में कविता, विचार और लोकसंगीत की गूंज, साहित्यिक व सांस्कृतिक संध्या ने मोहा मन

प्रयागराज। उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार द्वारा “चलो मन गंगा–यमुना तीर” श्रृंखला के अंतर्गत आयोजित नाद-ब्रह्म शिल्प मेला प्रयागराज में सोमवार को साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की भावपूर्ण छटा देखने को मिली।

कार्यक्रम का शुभारंभ केंद्र निदेशक सुदेश शर्मा द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इसके पश्चात आयोजित कवि सम्मेलन में राष्ट्र, संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत रचनाओं ने श्रोताओं को भावविभोर कर दिया।

कवि सम्मेलन में वीर रस और आध्यात्म का संगम

नाद-ब्रह्म शिल्प मेला प्रयागराज

कवि अभिजीत मिश्रा ने “औरंगजेब बोला हंसकर…” कविता के माध्यम से वीर रस की प्रभावशाली प्रस्तुति दी।
कवयित्री पल्लवी मिश्रा ने प्रेम और ठहराव की अनुभूति को शब्दों में पिरोया, जबकि आरती सिंह ने राम-सीता के आदर्शों पर आधारित काव्य पाठ से वातावरण को आध्यात्मिक बना दिया।
कवि वासुदेव पाण्डेय और अभिन्यु शुक्ला की ओजस्वी रचनाओं ने तालियों की गूंज बढ़ा दी।

नाद-ब्रह्म शिल्प मेला प्रयागराज के साहित्यिक संगोष्ठी में माघ मेले पर विमर्श

साहित्यिक संगोष्ठी में मुख्य वक्ता डॉ. धनंजय चोपड़ा ने “माघ मेला : सामाजिक समरसता का वैश्विक तीर्थ” विषय पर विचार रखते हुए कहा कि संगम तट पर साकार होती सामाजिक समरसता विश्व के लिए प्रेरणा है।
डॉ. चितरंजन कुमार ने कहा कि माघ मेला आत्ममंथन, संवाद और सांस्कृतिक चेतना का सशक्त माध्यम है।

लोकसंगीत ने बांधा समां

सांस्कृतिक संध्या में भोजपुरी गायक विकास मिश्रा ने गणेश वंदना सहित कई लोकप्रिय गीतों की प्रस्तुति देकर श्रोताओं को झूमने पर मजबूर कर दिया।
वहीं स्वाती निरखी और लोक कलाकारों की जबावी बिरहा प्रस्तुति ने नाद-ब्रह्म शिल्प मेला प्रयागराज में लोकसंस्कृति की जीवंत परंपरा को साकार कर दिया।

कार्यक्रम का संचालन सुधांशु शुक्ला ने किया। इस अवसर पर मनोज गुप्ता, श्लेष गौतम, डॉ. कृष्णा नंद पाण्डेय, बाबू लाल भंवरा सहित अनेक साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।

बिंदुविवरण
आयोजननाद-ब्रह्म शिल्प मेला प्रयागराज
स्थानउत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र
आयोजकसंस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार
प्रमुख गतिविधियांकवि सम्मेलन, संगोष्ठी, लोकसंगीत
उद्देश्यसंस्कृति, समरसता और लोक परंपरा का संवर्धन

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